कहा कि जब धर्म की आड़ में अधर्म होने लगे और तर्क के माध्यम से अधर्म को ही धर्म सिद्ध करने का प्रयास किया जाने लगे, तब वही स्थिति धर्म की ग्लानि कहलाती है. ऐसे समय में भगवान मानवता और धर्म की रक्षा के लिए अवतार लेते हैं.
- धर्म की आड़ में अधर्म बढ़े तो होता है ईश्वर का अवतार : कृष्णानंद शास्त्री "पौराणिक जी"
- श्रीमद्भागवत को बताया कलियुग में भगवान श्रीकृष्ण का प्रत्यक्ष स्वरूप
बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : सर्वजन कल्याण सेवा समिति, सिद्धाश्रम धाम बक्सर द्वारा आयोजित 18वें धर्म आयोजन के पंचम दिवस पर श्रीमद्भागवत कथा में धर्म, कर्म और सनातन परंपरा की गहन व्याख्या की गई. कथा आचार्य कृष्णानंद शास्त्री "पौराणिक जी" ने कहा कि धर्मशास्त्र का दूसरा नाम कर्मशास्त्र है और सनातन धर्म की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि धर्म ही कर्म है तथा कर्म ही धर्म है. उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत केवल कथा नहीं, बल्कि मानव जीवन को सही दिशा देने वाला दिव्य ग्रंथ है.
कथा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण के अवतार का प्रसंग सुनाते हुए कृष्णानंद शास्त्री "पौराणिक जी" ने बताया कि आज से लगभग 5260 वर्ष पूर्व मथुरा में राजा कंस के कारागार में माता देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था. उन्होंने कहा कि जब धर्म की आड़ में अधर्म होने लगे और तर्क के माध्यम से अधर्म को ही धर्म सिद्ध करने का प्रयास किया जाने लगे, तब वही स्थिति धर्म की ग्लानि कहलाती है. ऐसे समय में भगवान मानवता और धर्म की रक्षा के लिए अवतार लेते हैं.
उन्होंने कहा कि कंस, जरासंध, दुर्योधन, शकुनि और दुःशासन जैसे पात्र शक्तिशाली, संपन्न और देवताओं के उपासक थे, फिर भी उन्हें अत्याचारी और पापी कहा गया. इसका कारण यह था कि उन्होंने अपनी शक्ति और सामर्थ्य का उपयोग लोककल्याण के बजाय स्वार्थ और अत्याचार के लिए किया. जब तपस्या और भक्ति से प्राप्त शक्ति समाज के हित के बजाय उसके विनाश का कारण बनने लगे, तब ऐसा व्यक्ति राक्षसी प्रवृत्ति का प्रतीक बन जाता है.
कथा आचार्य ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का अवतार साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और सनातन धर्म की पुनर्स्थापना के लिए हुआ था. यही प्रत्येक अवतार का मूल उद्देश्य भी है. उन्होंने कहा कि इतिहास और धर्मग्रंथों का संदेश स्पष्ट है कि केवल पूजा-पाठ या बाहरी आडंबर से कोई धर्मात्मा नहीं बन जाता, बल्कि उसके कर्म ही उसकी वास्तविक पहचान तय करते हैं.
कृष्णानंद शास्त्री "पौराणिक जी" ने वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों पर भी चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा कि आज भी कुछ लोग साधु, संत, सन्यासी, महंत या कथावाचक का रूप धारण कर समाज का विश्वास जीत लेते हैं, लेकिन बाद में धर्म के नाम पर लोगों को भ्रमित कर गलत मार्ग पर ले जाने का प्रयास करते हैं. ऐसे पाखंड और कुप्रवृत्तियों से समाज को सावधान रहने की आवश्यकता है.
उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा समाज को सही और गलत के बीच अंतर समझाने की शक्ति देती है. जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने कंस और अन्य अत्याचारियों का अंत कर धर्म की रक्षा की थी, उसी प्रकार भागवत कथा भी समाज को पाखंड, अंधविश्वास और मिथ्या आचरण से बचाने का कार्य करती है. कथा के अंत में उन्होंने कहा कि कलियुग में श्रीमद्भागवत ही भगवान श्रीकृष्ण का प्रत्यक्ष स्वरूप है, जो मानव समाज को धर्म, सत्य और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है.





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