कई बार हादसे इतने गंभीर होते हैं कि घायलों को तत्काल बेहतर इलाज की जरूरत पड़ती है. बावजूद इसके कार्यकारी एजेंसी पीएनसी इंफ्राटेक द्वारा केवल एक एम्बुलेंस की व्यवस्था की गई है, जो दलसागर टोल प्लाजा के पास से संचालित होती है.
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बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : बिहार को उत्तर प्रदेश से जोड़ने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग-922 (एनएच-922) इन दिनों यात्रियों के लिए सुरक्षित सफर के बजाय खतरे का रास्ता बनता जा रहा है. भरौली गोलंबर से लेकर भोजपुर जिले के शाहपुर तक फैले करीब 65 किलोमीटर लंबे इस हाईवे पर सड़क दुर्घटनाओं के बाद आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था बेहद बदहाल स्थिति में है.
जानकारी के अनुसार, इस हाईवे पर हर महीने औसतन 20 सड़क दुर्घटनाएं होती हैं. कई बार हादसे इतने गंभीर होते हैं कि घायलों को तत्काल बेहतर इलाज की जरूरत पड़ती है. बावजूद इसके कार्यकारी एजेंसी पीएनसी इंफ्राटेक द्वारा केवल एक एम्बुलेंस की व्यवस्था की गई है, जो दलसागर टोल प्लाजा के पास से संचालित होती है.
24 घंटे ड्यूटी पर सिर्फ एक चालक
सबसे चिंताजनक बात यह है कि 24 घंटे सातों दिन सेवा देने के लिए इस एम्बुलेंस पर सिर्फ एक चालक की तैनाती की गई है. लगातार ड्यूटी के कारण चालक पर मानसिक और शारीरिक दबाव बढ़ता है, जिससे खुद दुर्घटना की आशंका बनी रहती है. नियमों के मुताबिक आपातकालीन सेवाओं में अलग-अलग शिफ्ट में चालक तैनात होने चाहिए, लेकिन यहां मानकों की अनदेखी साफ दिखाई दे रही है. दलसागर टोल प्लाजा पर मिले चिकित्साकर्मी सुनील कुमार बताते हैं कि एंबुलेंस सेवा के लिए दिन और रात के लिए अलग-अलग दो चिकित्सा कर्मी हैं, जिनमें उनके अतिरिक्त मुकेश कुमार तथा दोनों शिफ्ट के लिए एक ही ड्राइवर आदेश यादव सेवाएं देते हैं.
बड़ी दुर्घटना हुई तो हालात होंगे भयावह
स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब किसी बड़े हादसे की कल्पना की जाए. इस एम्बुलेंस में केवल दो मरीजों को ले जाने की क्षमता है. यदि बस, ट्रक या कई वाहनों की टक्कर जैसी बड़ी दुर्घटना हो जाए, तो घायलों को तत्काल अस्पताल पहुंचाना लगभग असंभव हो सकता है. ऐसे समय में परिजन और राहगीर निजी वाहनों का सहारा लेने को मजबूर हो जाते हैं.
गोल्डन ऑवर’ में नहीं मिल पा रही बेहतर चिकित्सा
आपातकालीन सेवा प्रदाता वीके ग्लोबल अस्पताल के निदेशक तथा प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ वी के सिंह दुर्घटना के बाद का पहला घंटा यानी ‘गोल्डन ऑवर’ सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है. लेकिन सीमित संसाधनों के कारण कई बार मरीजों को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सकता. एंबुलेंस में ऑक्सीजन, मॉनिटर तथा अन्य बेसिक उपकरण भी होने चाहिए. जिनके सहारे मरीजों को अस्पताल तक लाया जा सके. साथ ही इस रूट पर काम से कम दो एंबुलेंस का होना अति आवश्यक है.
एंबुलेंस में गंभीर मरीजों के लिए नहीं है पर्याप्त व्यवस्था
एम्बुलेंस में केवल प्राथमिक उपचार की सुविधा उपलब्ध है. गंभीर चोट, सिर में गहरी चोट या आंतरिक रक्तस्राव जैसी स्थितियों में यह व्यवस्था नाकाफी साबित हो रही है. एम्बुलेंस में लाइफ सपोर्ट सिस्टम और आधुनिक चिकित्सा उपकरणों की भी कमी बताई जा रही है. हालांकि, चिकित्साकर्मी सुनील कुमार ने बताया कि एंबुलेंस में ऑक्सीजन तथा कुछ आवश्यक दवाई और बैंडेज आदि उपलब्ध हैं.
एनएचएआई मानकों की खुलेआम अनदेखी
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के मानकों के अनुसार व्यस्त राष्ट्रीय राजमार्गों पर प्रत्येक 25 से 30 किलोमीटर की दूरी पर एम्बुलेंस और पेट्रोलिंग वाहन की व्यवस्था होनी चाहिए. इस हिसाब से 65 किलोमीटर लंबे एनएच-922 खंड पर कम से कम दो से तीन एम्बुलेंस की जरूरत है. इसके बावजूद केवल एक एम्बुलेंस से पूरे क्षेत्र की जिम्मेदारी निभाई जा रही है.
स्थानीय लोगों ने उठाई सुरक्षा बढ़ाने की मांग
सड़क सुरक्षा समिति के सदस्य डॉ श्रवण कुमार तिवारी ने एनएचएआई पर सवाल उठाते हुए कहा है कि करोड़ों रुपये की परियोजनाओं के बीच आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं की ऐसी स्थिति गंभीर लापरवाही को दर्शाती है. उन्होंने कहा कि बैठकों में पहुंचने वाले एनएचएआई के अधिकारी दावा करते हैं कि चार एम्बुलेंस चलती हैं, लेकिन उनके द्वारा कितने रोगियों को सहायता पहुंचाई गई, यह पूछने पर कभी भी वह बात नहीं पाते.
हेल्पलाइन नंबर पर टिकी यात्रियों की उम्मीद
फिलहाल दुर्घटना की स्थिति में लोग 1033 एनएचएआई हेल्पलाइन और 112 पुलिस सहायता नंबर पर निर्भर हैं. लेकिन जब तक हाईवे पर एम्बुलेंस की संख्या, प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों और आधुनिक उपकरणों की व्यवस्था नहीं बढ़ाई जाती, तब तक एनएच-922 पर सफर करने वाले यात्रियों की सुरक्षा भगवान भरोसे ही बनी रहेगी.
कहते हैं अधिकारी
इस तरह की बात अगर सामने आई है तो इसकी जांच कराई जाएगी. एंबुलेंस संचालक के संदर्भ में जो गाइडलाइन होगी उसका अनुपालन हर हाल में कराया जाएगा.
अविनाश कुमार
अनुमंडल पदाधिकारी,
सदर अनुमंडल, बक्सर






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