वीडियो: बिना अग्नि संस्कार के मोक्ष नहीं प्राप्त कर सकता मनुष्य: आचार्य भारत भूषण

उन्होंने बताया कि, शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है. ऐसे में मृत्यु के बाद शरीर को अग्नि-संस्कार के द्वारा उन्हीं पंचतत्व में समाहित कर दिया जाता है क्योंकि, शरीर पंचतत्व से ही मिलकर बना है और जिससे आपने यह शरीर प्राप्त किया है यदि उसे पूरा वापस नहीं करते तो अगले जन्म में पुनः पूरा आकार भी प्राप्त नहीं हो पाता. 

 


 




- गंगा में कुछ भी प्रवाहित करना घोर अपराध
- पर्यावरण के साथ-साथ मनुष्यता पर भी है खतरा

बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर: शास्त्र के अनुसार शवों को किसी भी हालत में गंगा में बहाया नहीं जा सकता. बिना अग्नि संस्कार के जीव मोक्ष प्राप्त ही नहीं कर सकता. उसकी बहुत दुर्गति हो जाती है. ऐसे में अग्नि संस्कार बेहद जरूरी है. यह कहना है श्रीसनातनशक्तिपीठसंस्थानम के अध्यक्ष प्रसिद्ध रामायण-भागवत वक्ता आचार्य भारत भूषण महाराज का. उन्होंने बताया कि, शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है. ऐसे में मृत्यु के बाद शरीर को अग्नि-संस्कार के द्वारा उन्हीं पंचतत्व में समाहित कर दिया जाता है क्योंकि, शरीर पंचतत्व से ही मिलकर बना है और जिससे आपने यह शरीर प्राप्त किया है यदि उसे पूरा वापस नहीं करते तो अगले जन्म में पुनः पूरा आकार भी प्राप्त नहीं हो पाता. 




उन्होंने बताया कि गंगा जी में कुछ भी यूं ही बहा देना घोर अपराध है क्योंकि, गंगा जी ब्रह्म द्रव्य यानि द्रविभूत परमात्मा का स्वरुप हैं. गंगा में यूं ही कुछ डाल देना इतना बड़ा अपराध है जिसका कोई वर्णन नहीं कर सकता. पद्मपुराण में गंगा जी, यमुना जी तथा अन्य पवित्र तीर्थों में स्नान करने के लिए 40 नियम बताए गए हैं। उन 40 नियमों में गंगा जी के 1 किलोमीटर के अंदर तक कहीं कपड़ा नहीं धोना है. ऐसे में इस तरह से लोगों के द्वारा शवों का प्रवाह करना निश्चित रूप से गंगा जी, पर्यावरण तथा मनुष्यता के ऊपर बहुत बड़ा संकट है. इतना ही नहीं जो लोग दिवंगत हो गए हैं उनका भी घोर अपमान है. अपने यहां कोई भी ऐसा संप्रदाय नहीं है जिनमे शवों को इस प्रकार बहाने की परंपरा हो. इस तरह शवों को बहाए जाने का वर्णन कहीं भी शास्त्र में नहीं है.

इस कारण से केवल दंडी सन्यासियों को बक्से में डाल कर दी जाती है जल समाधि:

आचार्य ने बताया कि दंडी संन्यासियों को लकड़ी अथवा लोहे के बनाए गए बक्से में डाल कर विधि विधान के साथ जल समाधि देने की परंपरा है. दरअसल, दंडी सन्यासी जीते जी अपना अंतिम संस्कार कर लेते हैं और अपनी मुखाग्नि भी दे देते हैं. ऐसे में जिन्होंने एक बार अपने को जला दिया अथवा वह ज्ञान की अग्नि में जल गए वैसे लोगों को जल समाधि दी जाती है लेकिन, इसके अतिरिक्त अन्य साधु-संतों के शरीर का भी अग्नि संस्कार मोक्ष प्राप्ति के लिए बेहद जरूरी है. सर्पदंश के शिकार ऐसे लोगों को केले के थम्भ में बांधकर बहाए जाने की परंपरा है जिनके दोबारा जीवित होने की प्रबल उम्मीद होती है. केले के थम्भ में बांधने के कारण लोगों की भी उन पर नजर पड़ती है.

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