लंबित मामलों के बोझ के नीचे दब गया उपभोक्ताओं का अधिकार ..

उपभोक्ता आयोग पूरी तरह से सरकारी ऑफिस बन गया जहां 12:00 बजे लेट नहीं और 3:00 बजे भेंट नहीं के पैटर्न पर काम होने लगा. बाद में तो स्थिति यह हो गई अध्यक्ष तथा अन्य सदस्य हफ्ते में तथा फिर महीने में एक बार यहां केवल हाजिरी बनाने के लिए पहुंचने लगे. ऐसे में साल दर साल लंबित मामलों का बोझ भी बढ़ता चला गया.

 







- उपभोक्ताओं को जगाकर स्वयं सो गए जिम्मेदार
- अध्यक्ष करते हैं फोन पर न्याय दिलाने का दावा

बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : जिले अबकी उपभोक्ता संरक्षण इकाई उपभोक्ताओं को न्याय दिलाने में विफल साबित हो रही है. यहां साल दर साल लंबित मामलों का बोझ बढ़ता जा रहा है खास बात तो यह है की इस इकाई के अध्यक्ष स्वयं पटना में बैठे-बैठे इकाई के बेहतर संचालन का दावा करते हैं लेकिन ऐसा हो नहीं पाता. वर्ष 1986 में संसद द्वारा उपभोक्ता संरक्षण आयोग का गठन होने के बाद उपभोक्ताओं को त्वरित न्याय की उम्मीद जगी थी. बाद में केंद्र ने राज्य सरकार के द्वारा सभी जिलों में उपभोक्ता संरक्षण आयोग की इकाई की स्थापना की गई लेकिन, उपभोक्ताओं को न्याय नहीं मिल सका. जिले में वर्ष 1996 में उपभोक्ता संरक्षण आयोग की इकाई की स्थापना के बाद कुछ समय तक तो उपभोक्ताओं को त्वरित न्याय लेकिन फिर लंबित मामलों का अंबार बढ़ गया.





बताया जा रहा है कि तकरीबन छह वर्ष पूर्व तक अध्यक्ष का पदभार सेवानिवृत्त अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश नारायण पंडित संभाल रहे थे. उनके कार्यकाल तक भी लोगों के न्याय की उम्मीद जगी रही लेकिन, उनकी सेवानिवृत्ति के साथ ही यहां लोगों को मिलने वाले न्याय की भी निवृत्ति हो गई. लोग बहुत उम्मीद के साथ यहां मुकदमा दाखिल कर आते हैं लेकिन, नए ( पुराने) अध्यक्ष राधेश्याम सिंह के पदस्थापना के साथ ही उपभोक्ता आयोग पूरी तरह से सरकारी ऑफिस बन गया जहां 12:00 बजे लेट नहीं और 3:00 बजे भेंट नहीं के पैटर्न पर काम होने लगा. बाद में तो स्थिति यह हो गई अध्यक्ष तथा अन्य सदस्य हफ्ते में तथा फिर महीने में एक बार यहां केवल हाजिरी बनाने के लिए पहुंचने लगे. ऐसे में साल दर साल लंबित मामलों का बोझ भी बढ़ता चला गया.

जानकार बताते हैं कि नई नियमावली के मुताबिक अब अध्यक्ष की अनुपस्थिति में कोई भी आदेश पारित नहीं किया जा सकता यानि कि किसी भी मामले की सुनवाई करने के बाद भी उसका फैसला नहीं लिया जा सकता. ऐसे में जब अध्यक्ष महीने में केवल एक दिन ही यहां आते हैं तो सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस प्रकार मामलों की सुनवाई और उनका निष्पादन होता होगा? सूत्रों की माने तो जब किसी मामले का निष्पादन बेहद आवश्यक होता है तब आदेशपाल फाइल लेकर पटना जाते हैं और वहां से अध्यक्ष का हस्ताक्षर करा कर लौटते हैं.

सबसे ज्यादा नान बैंकिंग तथा मेडिकल से जुड़े मामले हैं लंबित : 

उपभोक्ता न्यायालय में सबसे ज्यादा मामले नान बैंकिंग कंपनियों के द्वारा उपभोक्ताओं की ठगी से जुड़े हुए आते हैं. 2014, 15 तथा 16 में सहारा समेत कई नान बैंकिंग कंपनियों की ठगी का शिकार हुए व्यक्तियों ने यहां परिवाद दायर कराया लेकिन, मामले अब तक लंबित हहैं. बताया जा रहा है कि यह 90 दिन में मामलों को निष्पादित कर देना है लेकिन निष्पादन करने के लिए 900 दिन भी कम पड़ जा रहे हैं.

अधिवक्ताओं ने बताया न्याय मिलने में हो रही देरी, आदेश का भी नहीं हो पा रहा अनुपालन :

अधिवक्ता महेंद्र कुमार चौबे ने बताया कि न्याय मिलने में यहां भी काफी देरी हो रही है वहीं, विनोद कुमार मिश्रा बताते हैं कि मामले यहां वर्षों से लंबित हैं. कई मामलों में न्याय मिला है लेकिन, आदेश का अनुपालन नहीं कराया जा रहा. उन्होंने कहा कि बिजली कंपनी से जुड़े एक मामले में उपभोक्ता के पक्ष में आदेश दिया गया लेकिन, उस आदेश का अनुपालन बिजली कंपनी के द्वारा साल भर से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद नहीं कराया गया. ऐसे में सहज ही समझा जा सकता है कि उपभोक्ता न्यायालय किस प्रकार लोगों को न्याय दिला रहा है.

कहते हैं अध्यक्ष :

मामलों के निष्पादन में विलंब होने के कई तरह के कारण हैं. पहले तो उन्हें विभिन्न जिलों के कंजूमर फोरम का प्रभार दे दिया गया था उसके चलते भी काम कुछ विलंब से हुआ लेकिन, अब उनके जिम्मे केवल बक्सरकी जिम्मेदारी है हालांकि, मौसम ठीक नहीं होने के कारण वह जिले में पहुंच नहीं पाते. ऐसे में पटना बैठे-बैठे ही फोन आदि के माध्यम से वह उपभोक्ता फोरम की गतिविधियों की जानकारी लेते रहते हैं. उन्होंने बताया कि हर वर्ष तकरीबन 100 मामले कंजूमर फोरम में आते हैं जिनमें अलग-अलग कारणों से मामले वर्षों से लंबित हैं. जैसे ही परिस्थितियां कुछ सामान्य होती हैं, मामलों के निष्पादन के संदर्भ में उचित प्रबंध किया जाएगा.

राधेश्याम सिंह
अध्यक्ष, कंज्यूमर फोरम




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