जिस मैदान से बदला था भारत का भविष्य, 484 वर्ष बाद भी उसे अपने उद्धार का इंतजार ..

सभी नेताओं को भी शेरशाह से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है कि उन्होंनेकिस प्रकार जीटी रोड का निर्माण, धर्मशालाओं का निर्माण समेत भारत के विकास के लिए कई कार्य किए थे. चौसा के ऐतिहासिक लड़ाई मैदान को पर्यटन स्थल का दर्जा मिलने तक उनका संघर्ष जारी रहेगा.






- शेरशाह और हुमायूं के बीच चौसा युद्ध के 484 वर्ष पूरे
- युद्ध मैदान की स्थिति जस की तस, अधिकारियों और नेताओं के वादे भी अधूरे

बक्सर टॉप न्यूज, बक्सर : 26 जून 1539 ईस्वी ना सिर्फ एक तारीख है, बल्कि बक्सर जिले के चौसा की पहचान भी है. जिसके एक भिश्ती ने मुगल सल्तनत के बादशाह को भी नवजीवन दिया था. उस दिन के बाद चौसा  न सिर्फ इतिहास के पन्नों में दर्ज हुआ बल्कि यहां के एक मामूली आदमी को पूरे हिंदुस्तान पर राज करने का मौका मिला. हम बात कर रहे हैं आज से 484 वर्ष पूर्व बक्सर जिले के चौसा की ऐतिहासिक धरती पर शेरशाह सुरी और मुगल सल्तनत के बादशाह हुमायूं के बीच हुई जंग की. जंग के बाद कुछ ऐसा हुआ जिसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की थी. अपनी साम्राज्यवादी सोच के साथ जिसमें अखंड भारत पर अपना परचम लहराया था उसे यहां हार का मुंह देखना पड़ा. जंग हार चुका हुमायूं अपने जीवन की जंग भी हार जाता. क्योंकि उसने शेरशाह के गोरिल्ला लड़ाकों से बचने के लिए उसने उफनती गंगा नदी में छलांग लगा दी थी. और उसकी तीन रानियां मौत की आगोश में समा चुकी थी. उसी वक्त चौसा का एक व्यक्ति जिसका नाम निजाम था उसने बादशाह हुमायूं को किसी तरह उफनती गंगा से बाहर निकाला. इस लड़ाई में कुल 8000 मुगल सैनिक मारे गए थे जिससे कि इतना रक्तपात हुआ कि गंगा का पानी भी लाल हो गया था.

इतिहास के पन्नों में यह बात दर्ज है कि जब बादशाह की जान बची तो उसने निजाम को तोहफे में भारत का साम्राज्य ही सौंप दिया. उन्होंने एक दिन के लिए उसे देश का बादशाह घोषित किया. अपनी एक दिन कि बादशाहीयत में निज़ाम ने चमड़े का सिक्का चलवा दिया जो कि आज भी एक अविस्मरणीय घटना है. इस लड़ाई के बाद पूरे भारत में बक्सर के चौसा की चर्चा हुई. चौसा की लड़ाई का मैदान इतिहास की कई किताबों में स्वर्णाक्षरों में दर्ज किया गया है. जिसमें भारत की सत्ता पलट कर रख दी थी, इतना ही नहीं 2011 में पुरातत्व विभाग द्वारा इस ऐतिहासिक विरासत की खुदाई करवाई गई, जिसमें जैन धर्म, पाल वंश से लेकर गुप्त काल तक के अवशेष और प्राचीनतम प्रतिमाएं मिली, प्रतिमाओं की पहचान करने के साथ ही पुरातत्व विभाग ने इसे 5000 वर्ष पुरानी बताया. बाद में 2012 में यहां पहुंचने के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा था कि इस मैदान का विकास किया जाएगा परंतु आज इस ऐतिहासिक मैदान की दुर्दशा ऐसी हो गई है जिसे शब्दों में बयां करना संभव नहीं है. 

विजयोत्सव के रूप में मनाया गया आज का दिवस : 

प्रशासनिक अधिकारियों ने यह वादे तो जरूर किए कि चौसा की ऐतिहासिक भूमि और को न सिर्फ उसका खोया हुआ सम्मान दिलाया जाएगा बल्कि इसे एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा, कोशिशें भी हुई लेकिन कोई कोशिश धरातल पर नहीं उतरी आज एक बार फिर चौसा के ऐतिहासिक युद्ध की वर्षगांठ पर पूर्व जिला परिषद सदस्य एवं स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता डॉ मनोज यादव तथा उनके सहयोगियों ने यहां पौधरोपण कर एक तरफ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जल जीवन हरियाली को बल दिया है वहीं लोगों को अपनी ऐतिहासिक विरासतों संरक्षण के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया. साथ ही तरफ प्रशासनिक पहल को भी आइना दिखाया. उन्होंने कहा कि शेरशाह सूरी के विजयोत्सव के रूप में यह दिवस मनाया जाता है. आज सभी नेताओं को भी शेरशाह से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है कि उन्होंनेकिस प्रकार जीटी रोड का निर्माण, धर्मशालाओं का निर्माण समेत भारत के विकास के लिए कई कार्य किए थे. चौसा के ऐतिहासिक लड़ाई मैदान को पर्यटन स्थल का दर्जा मिलने तक उनका संघर्ष जारी रहेगा.

शेरशाह सूरी जन कल्याण संस्थान ने किया पौधारोपण :

जिला मुख्यालय से 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित चौसा के इस ऐतिहासिक लड़ाई मैदान में शेरशाह सूरी जन कल्याण संस्थान के द्वारा चौसा के ऐतिहासिक चौसा के लड़ाई के मैदान और च्वयन मुनि आश्रम पर सैकड़ो पौधों का रोपण कर पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक किया. जहां संस्थान के अध्यक्ष डॉ मनोज यादव के अतिरिक्त मुफस्सिल थाने के प्रभारी थानाध्यक्ष सुनील कुमार निर्झर, उपचेयरमैन प्रतिनिधि विकास राज,  वार्ड पार्षद हृदय यादव, चन्दन कुमार,आंनद रावत, भाजपा प्रखण्ड अध्यक्ष अमर गोंड़, गंगा सेवक भरत पाण्डेय, अशोक यादव आदि लोग मौजूद रहे.









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