मां सरस्वती की मूर्तियां गढ़ते हाथ, खुद विद्या से वंचित जीवन ..

इन्हीं मूर्तियों के सामने कुछ ही दिनों बाद हजारों बच्चे विद्या, बुद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना करेंगे. विडंबना यह है कि इन मूर्तियों को गढ़ने वाला परिवार खुद आज भी विद्या के आशीर्वाद से वंचित है.



 






                                         



- रेल की पटरियों के किनारे प्लास्टिक की छत तले बसता है मूर्तिकार परिवार का संघर्ष
- देवी की सेवा में जीवन, लेकिन शिक्षा और सरकारी योजनाओं से अब भी दूर

बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : रेल की पटरियों के पास प्लास्टिक की छत तले बैठा एक परिवार मिट्टी में देवी की आकृति गढ़ रहा है. चारों तरफ मां सरस्वती की मूर्तियां हैं—वीणा, पुस्तक और हंस के साथ. इन्हीं मूर्तियों के सामने कुछ ही दिनों बाद हजारों बच्चे विद्या, बुद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना करेंगे. विडंबना यह है कि इन मूर्तियों को गढ़ने वाला परिवार खुद आज भी विद्या के आशीर्वाद से वंचित है.

राजस्थान के पाली जिले के प्रतापगढ़ गांव के रहने वाले अम्बा लाल पिछले दस वर्षों से बक्सर रेलवे स्टेशन के मैदान में मां सरस्वती की प्रतिमाएं बना रहे हैं. उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि पढ़ाई उनके जीवन का हिस्सा बन पाएगी. पांचवीं के बाद स्कूल छूट गया और जिंदगी मिट्टी, रंग और औजारों में सिमटती चली गई.

उनकी पत्नी सुगना, जो मूर्तियों की बारीक नक्काशी करती हैं, निरक्षर हैं. भतीजा अशोक कुमार चारण, जो देवी के चेहरे की मुस्कान को आकार देता है, वह भी पांचवीं से आगे नहीं पढ़ सका. पिता उटा राम, जिनके हाथों में आज भी रंग की परतें चढ़ी हैं, उन्होंने कभी अक्षर नहीं पहचाने. पूरा परिवार देवी की सेवा में लगा है, लेकिन देवी की विद्या इनके घर का रास्ता अब तक नहीं खोज पाई.

अम्बा लाल बताते हैं कि इस बार उन्होंने करीब डेढ़ लाख रुपये लगाकर सौ के आसपास छोटी-बड़ी मूर्तियां बनाई हैं. धनसोई से लेकर राजपुर और ब्रह्मपुर के योगियां गांव तक ऑर्डर आए हैं—1500 से 7000 रुपये तक की मूर्तियां. फिर भी चिंता बनी हुई है. सभी मूर्तियां बिक जाने के बाद भी तीन महीने की मेहनत में महज 50 से 60 हजार रुपये ही हाथ आएंगे. 23 जनवरी सरस्वती पूजा के दिन मां सरस्वती की मूर्तियां स्थापित होनी हैं, इसलिए हर हाल में 21 जनवरी तक प्रतिमाएं तैयार करनी हैं.

प्लास्टिक के टेंट में पूरा परिवार रहता है—उसी में जीवन भी है और देवी भी. पास से गुजरती ट्रेनें मानो याद दिलाती हैं कि इनका जीवन भी एक यात्रा है—राजस्थान से बिहार, बिहार से तेलंगाना. सरस्वती पूजा के बाद गणेश जी की मूर्तियां बनाने यह परिवार हैदराबाद चला जाएगा.

सबसे बड़ा दर्द अम्बा लाल की आंखों में तब उतर आता है, जब वे अपनी 12 साल की बेटी पूनम की बात करते हैं. पूनम अभी पहली कक्षा में पढ़ रही है. बेटी बड़ी हो गई है, पढ़ाई पीछे छूट गई—यह सोच उन्हें अंदर से तोड़ देती है. वे कहते हैं, “हैदराबाद में दाखिला दिलाने की कोशिश करेंगे… शायद वहां मां सरस्वती सुन लें.”

विडंबना यह भी है कि वर्षों से देवी-देवताओं की सेवा करने वाला यह परिवार किसी सरकारी योजना की सूची में नहीं है. न आवास, न शिक्षा सहायता, न स्वास्थ्य सुरक्षा. असंगठित श्रमिक की तरह जीवन बीत रहा है—बिना पहचान, बिना सहारे.

रेल की पटरियों के समानांतर चलती इस जिंदगी को आज भी मां सरस्वती और गणेश जी के आशीर्वाद की दरकार है. सवाल यह है कि जिस परिवार के हाथों से विद्या की देवी आकार लेती हैं, उस परिवार तक विद्या और सम्मान कब पहुंचेगा?






Post a Comment

0 Comments