कहा कि भगवान की छवि केवल मंगलमयी नहीं, बल्कि परम मंगलमयी है. यह महोत्सव भगवत भक्त पूज्य मामा महाराज की स्मृति में आयोजित है, जो स्वयं भगवत शास्त्र के साक्षात स्वरूप थे.
![]() |
| कथा कहते आचार्य रत्नेश |
- भक्ति के शिखर पर 18वां प्रिया–प्रियतम महोत्सव
- मामा जी महाराज की स्मृति में प्रथम दिवस गूंजा कृष्ण–भक्ति का अमृत
बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : 18वां प्रिया–प्रियतम महोत्सव भक्ति, वैराग्य और ज्ञान के अद्भुत संगम के साथ आरंभ हुआ. प्रथम दिवस कथा व्यास आचार्य रत्नेश जी महाराज के ओजस्वी प्रवचनों ने श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया. उन्होंने कहा कि भगवान की छवि केवल मंगलमयी नहीं, बल्कि परम मंगलमयी है. यह महोत्सव भगवत भक्त पूज्य मामा महाराज की स्मृति में आयोजित है, जो स्वयं भगवत शास्त्र के साक्षात स्वरूप थे. भगवत का प्रसाद यही है कि कथा सुनने वाला श्रोता भी भागवत स्वरूप बन जाता है.
आचार्य रत्नेश जी महाराज ने कहा कि व्यक्ति का धर्म, कर्म और जीवन यदि भागवत स्वरूप न बन सके तो ऐसा जीवन व्यर्थ है. पुराण भी 18 हैं और मामा जी महाराज की 18वीं निर्वाण तिथि होना कोई संयोग नहीं, बल्कि ईश्वरीय संकेत है. उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण कर कथा में प्रवेश कराया और कहा कि श्रीकृष्ण सत्, चित् और आनंदमय हैं.
प्रवचन के दौरान मामा जी महाराज की विशेषताओं को स्मरण करते हुए कहा गया कि वे वेद–पुराणों के गूढ़ श्लोकों को भी अपनी कथाओं में अत्यंत सरल बना देते थे. श्रीकृष्ण जीवन के तीनों तापों को नष्ट कर देते हैं और वही कथा सार्थक है, जो जीव को सीधे श्रीकृष्ण से मिला दे. उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवान और वैकुण्ठ में कोई अंतर नहीं है, भगवान स्वयं वैकुण्ठ हैं. कथा मृत्यु को भी आनंदमय बना देती है, इसलिए भक्त की मृत्यु भी महोत्सव बन जाती है.
उन्होंने अमृत मंथन, भगवान के चार स्वरूप, नारद जी द्वारा पृथ्वी को सर्वश्रेष्ठ लोक बताए जाने जैसे प्रसंगों को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया. साथ ही कहा कि विरक्त व्यक्ति का धन संग्रह करना पाप है और गृहस्थ जीवन में मर्यादा का पालन आवश्यक है. वृन्दावन को भक्ति, अयोध्या को वैराग्य और काशी को ज्ञान की भूमि बताते हुए उन्होंने कहा कि जहां-जहां भक्ति होती है, वहां-वहां भगवान को जाना ही पड़ता है.
कार्यक्रम में डा. रामनाथ ओझा ने कहा कि जो मन, वचन और कर्म से कथा सुनता है, उसके हृदय में भक्ति बैठ जाती है और जहां भक्ति बैठती है, वहां भगवान स्वयं विराजमान हो जाते हैं. उन्होंने कहा कि प्रत्येक संयोग का फल वियोग है, इसलिए जीवन में ज्ञान यज्ञ अर्थात कथा का आश्रय लेकर ही पापों का नाश और जीवन का उद्धार संभव है.
प्रथम दिवस की कथा ने श्रद्धालुओं के हृदय में गहरी आध्यात्मिक छाप छोड़ी और 18वें प्रिया–प्रियतम महोत्सव को भक्ति के उत्कर्ष पर पहुंचा दिया.




.png)


.png)
.gif)









0 Comments