कहा कि लोभ भविष्य की चिंता से जन्म लेने वाला ऐसा कुविचार है जो मनुष्य के भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों को कलंकित कर देता है. जैसे ही लोभ मन में प्रवेश करता है, मनुष्य का विवेक नष्ट होने लगता है और वह राक्षसी प्रवृत्तियों की ओर बढ़ जाता है.
- सिद्धाश्रम धाम में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन लोभ, मोह और क्रोध जैसे मानस रोगों पर हुआ विस्तार से चिंतन
- आचार्य कृष्णानंद शास्त्री पौराणिक जी महाराज ने हिरण्याक्ष प्रसंग के माध्यम से लोभ के दुष्परिणाम बताए
बक्सर टॉप न्यूज, बक्सर : सर्वजन कल्याण सेवा समिति, सिद्धाश्रम धाम बक्सर द्वारा आयोजित 18वें धर्म आयोजन के अंतर्गत चल रही श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के तीसरे दिन कथा व्यास आचार्य कृष्णानंद शास्त्री पौराणिक जी महाराज ने श्रद्धालुओं को दैहिक और मानसिक रोगों के अंतर तथा उनके उपचार के बारे में विस्तार से बताया. उन्होंने कहा कि मनुष्य को मुख्य रूप से दो प्रकार के रोगों का भय रहता है. पहला दैहिक रोग और दूसरा मानसिक रोग. दैहिक रोग शरीर से जुड़े होते हैं, जिनकी पहचान जांच, स्पर्श, परीक्षण और चिकित्सकीय परामर्श के माध्यम से की जा सकती है तथा दवाओं के सेवन से उनका उपचार संभव है. किंतु मानसिक रोग कहीं अधिक कष्टदायक और भयावह होते हैं, जिनकी औषधि केवल धर्मशास्त्रों और आध्यात्मिक साधना में निहित है.
आचार्य कृष्णानंद शास्त्री पौराणिक जी महाराज ने कहा कि मोह, काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और द्वेष जैसे विकार ही वास्तविक मानस रोग हैं. इनमें लोभ को सभी पापों, अत्याचारों और अनैतिक कार्यों की जननी बताया गया. उन्होंने कहा कि लोभ भविष्य की चिंता से जन्म लेने वाला ऐसा कुविचार है जो मनुष्य के भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों को कलंकित कर देता है. जैसे ही लोभ मन में प्रवेश करता है, मनुष्य का विवेक नष्ट होने लगता है और वह राक्षसी प्रवृत्तियों की ओर बढ़ जाता है.
कथा के दौरान उन्होंने हिरण्याक्ष का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि महात्मा कश्यप के पुत्र हिरण्याक्ष के मन में ऐसा लोभ उत्पन्न हुआ कि उसने पृथ्वी के समस्त रत्न, स्वर्ण और संपदा पर अधिकार करने की इच्छा कर ली. जब उसे ज्ञात हुआ कि ये सभी संपदाएं पृथ्वी में निहित हैं तो उसने पूरी पृथ्वी का ही हरण कर उसे सुतल लोक में छिपा दिया. तब भगवान नारायण ने वराह अवतार धारण कर हिरण्याक्ष का वध किया और पृथ्वी को पुनः सृष्टि के कल्याण के लिए स्थापित किया. उन्होंने कहा कि इतना बड़ा लोभी भी मृत्यु के समय अपने साथ एक तिनका तक नहीं ले जा सका.
कथा व्यास ने कहा कि आज समाज में व्याप्त अशांति, तनाव और अविश्वास के मूल में लोभ ही है. स्वार्थ ने मानव मूल्यों को कमजोर कर दिया है. झूठ, कपट, पाखंड और छल-कपट समाज में बढ़ते जा रहे हैं. ऐसे समय में श्रीमद्भागवत कथा मनुष्य को जीवन की वास्तविकता से परिचित कराती है और उसे परमार्थ के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है. उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा सभी मानस रोगों की अचूक दवा है और राजा परीक्षित इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं. कथा श्रवण के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे.






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