मौत के बढ़ते मामलों ने प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. लोगों का कहना है कि जब अस्पतालों का लाइसेंस ही स्पष्ट नहीं है, तो वहां होने वाले इलाज और किसी भी अप्रिय घटना की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा.
- कागजों में नियम, जमीनी हकीकत में बेखौफ इलाज, मरीजों की जान जोखिम में
- प्रसव के दौरान मौतों ने खोल दी स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल
बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : जिले में निजी नर्सिंग होम के लाइसेंस का समय पर नवीनीकरण नहीं होने से स्वास्थ्य व्यवस्था गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है. मौजूदा हालात में किसी भी निजी अस्पताल को पूरी तरह वैध कहना मुश्किल हो गया है. इसके बावजूद जिले में धड़ल्ले से इलाज, ऑपरेशन और प्रसव कराए जा रहे हैं, जो सीधे तौर पर मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ है. नर्सिंग होम संचालकों के सामने अपने ही अस्पताल की वैधता को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है, लेकिन इलाज का कारोबार बिना रोक-टोक जारी है.
इसी बीच निजी नर्सिंग होम्स, खासकर गर्भवती महिलाओं के प्रसव के दौरान मौत के बढ़ते मामलों ने प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. लोगों का कहना है कि जब अस्पतालों का लाइसेंस ही स्पष्ट नहीं है, तो वहां होने वाले इलाज और किसी भी अप्रिय घटना की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा.
लाइसेंस से दोगुना अस्पताल हो रहे संचालित
आंकड़ों के अनुसार बक्सर अनुमंडल में 46 और डुमरांव अनुमंडल में 21 निबंधित निजी अस्पताल बताए जाते हैं, जबकि सूत्रों का दावा है कि जिले में 150 से अधिक अस्पताल बिना विशेषज्ञ चिकित्सक और आवश्यक जीवनरक्षक सुविधाओं के संचालित हो रहे हैं. जिला मुख्यालय क्षेत्र में सदर अस्पताल के आसपास और कोइरपुरवा इलाके के कई नर्सिंग होम्स को लेकर पहले भी गंभीर शिकायतें सामने आती रही हैं.
15 हजार रुपये में डिलीवरी, 5 हजार रुपये में गर्भपात
सूत्र बताते हैं कि कई नर्सिंग होम्स में 15 हजार रुपये में ऑपरेशन से डिलीवरी और पांच से सात हजार रुपये में अवैध गर्भपात कराया जाता है. इस प्रक्रिया में मरीज की जान की कोई ठोस गारंटी नहीं होती. कुछ मामलों में अवैध अल्ट्रासाउंड संचालकों से साठ-गांठ की भी चर्चा है, जहां नियमों को ताक पर रखकर भ्रूण जांच जैसी गतिविधियां कराई जाती हैं.
डीएम के निर्देश पर गठित हुई जांच कमिटी
सिविल सर्जन डॉ शिव कुमार प्रसाद चक्रवर्ती ने बताया कि डीएम के आदेश पर एक कमिटी का गठन किया गया है. यह कमिटी सभी निजी अस्पतालों की जांच करेगी और गाइडलाइन के आधार पर निबंधन का नवीनीकरण किया जाएगा.
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य विभाग इन अवैध और अनियमित अस्पतालों पर सख्त कार्रवाई करेगा या फिर यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा और आम लोगों की जान लगातार जोखिम में पड़ती रहेगी.




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