वीडियो : तेज रफ्तार ट्रेन की तैयारी, लेकिन पटरी पर मजदूरों की जान जोखिम में ..

ट्रैक की भार क्षमता 52 किलोग्राम से बढ़ाकर 60 किलोग्राम की जा रही है, ताकि ट्रेनों की रफ्तार बढ़ाई जा सके और भारी मालगाड़ियों का परिचालन सुचारु हो. तकनीकी दृष्टि से यह काम रेलवे के लिए अहम है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है.






                                         




  • 52 किलो से 60 किलो भार क्षमता के लिए बदले जा रहे स्लीपर, सुरक्षा इंतजाम नदारद
  • ठेकेदार और रेलवे के बीच जिम्मेदारी की रस्साकशी, श्रमिक असुरक्षित

बक्सर टॉप न्यूज, बक्सर : दानापुर–पंडित दीनदयाल उपाध्याय रेल खंड पर ट्रैक उन्नयन का काम भले ही तेजी से चल रहा हो, लेकिन इसी रफ्तार में मजदूरों की सुरक्षा पीछे छूटती नजर आ रही है. स्लीपर बदलने के दौरान सामने आई तस्वीरों ने रेलवे की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. 

डुमरांव रेलवे स्टेशन से दिलदारनगर रेलवे स्टेशन तक रेलवे ट्रैक के स्लीपर बदलने का कार्य युद्धस्तर पर किया जा रहा है. बताया जा रहा है कि ट्रैक की भार क्षमता 52 किलोग्राम से बढ़ाकर 60 किलोग्राम की जा रही है, ताकि ट्रेनों की रफ्तार बढ़ाई जा सके और भारी मालगाड़ियों का परिचालन सुचारु हो. तकनीकी दृष्टि से यह काम रेलवे के लिए अहम है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है.

बक्सर रेलवे स्टेशन के समीप स्थित रेल पुल के पास स्लीपर बदलने के दौरान काम कर रहे श्रमिक बिना किसी सुरक्षा उपकरण के नजर आए. न उनके हाथों में दस्ताने थे और न पैरों में सुरक्षा जूते. भारी स्लीपर और ट्रैक के बीच काम कर रहे इन मजदूरों के लिए एक छोटी सी चूक भी बड़े हादसे में बदल सकती है.

मौके पर मौजूद सेक्शन इंजीनियर इरफान आलम ने बताया कि अधिकांश कार्य मशीनों के माध्यम से कराया जा रहा है, लेकिन पुल और संवेदनशील स्थानों पर मैनुअली काम कराना पड़ता है. उन्होंने कहा कि रेलवे अपने श्रमिकों को सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराती है, लेकिन यहां काम कर रहे मजदूर ठेकेदार द्वारा लगाए गए हैं, ऐसे में उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी ठेकेदार की है.

वहीं, काम कर रहे श्रमिकों ने साफ तौर पर कहा कि उन्हें ठेकेदार की ओर से कोई भी सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं कराया गया है. मजदूरों का कहना है कि काम करना उनकी मजबूरी है, लेकिन सुरक्षा के बिना हर पल डर बना रहता है.

तेज रफ्तार ट्रेनों की तैयारी के बीच अगर मजदूरों की जान ही असुरक्षित रहे, तो यह विकास की तस्वीर पर बड़ा सवालिया निशान है. अब देखना यह है कि रेलवे और ठेकेदार इस गंभीर लापरवाही पर कब तक आंख मूंदे रहते हैं.

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