चारों दिशाओं में देखने की इच्छा से उनके चार मुख प्रकट हुए. ब्रह्माजी के मानस पुत्र सनक, सनंदन, सनातन और सनत कुमार हुए. उनके मुख से धर्म और पीठ से अधर्म प्रकट हुआ. मनु और शतरूपा से सृष्टि का विस्तार आरंभ हुआ.
- सीताराम विवाह महोत्सव में श्रीमद्भागवत कथा ने भक्तों को किया भावविभोर
- आचार्य रत्नेश ठाकुर जी ने बताया—अनन्य भक्ति से मिट जाते हैं सारे भय और बंधन
बक्सर टॉप न्यूज, बक्सर : नगर के नया बाजार आश्रम में आयोजित सीताराम विवाह महोत्सव के अंतर्गत श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण भक्तों के लिए आध्यात्मिक सौभाग्य बन गया. आचार्य रत्नेश ठाकुर जी ने कहा कि यह भूमि भगवान वामन को प्रकट करने वाली, महर्षि विश्वामित्र की कर्मभूमि और गंगा माता से सिंचित पवित्र धरती है. पूज्य मामाजी महाराज की इस कर्मभूमि में कथा सुनना और गाना अपने आप में जीवन का वैभव है.
कथा में सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए आचार्य ने बताया कि सर्वप्रथम ब्रह्माजी प्रकट हुए. चारों दिशाओं में देखने की इच्छा से उनके चार मुख प्रकट हुए. ब्रह्माजी के मानस पुत्र सनक, सनंदन, सनातन और सनत कुमार हुए. उनके मुख से धर्म और पीठ से अधर्म प्रकट हुआ. मनु और शतरूपा से सृष्टि का विस्तार आरंभ हुआ.
आचार्य ने कहा कि सृष्टि निर्माण में नारी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है. पश्चाताप पाप का प्रायश्चित है और एक बार जो भगवान का हो जाता है, उसे बड़े से बड़े पतन से भी प्रभु स्वयं उबार लेते हैं.
उन्होंने भक्ति के तीन नियम बताए—अनन्य अध्यात्म, अनन्य सेवकत्व और अनन्य आज्ञाकारिता. आचार्य ने कहा कि संसार दोषयुक्त व्यक्ति को स्वीकार नहीं करता, लेकिन भगवान ऐसे व्यक्ति को भी अपनाकर सुधार देते हैं. हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु जैसे दुष्टों के उद्धार और विनाश हेतु भगवान ने अवतार लिया.
मनु-शतरूपा के मंगलमय विवाह और वराह अवतार की कथा के माध्यम से उन्होंने आदर्श दांपत्य जीवन का संदेश दिया. उन्होंने कहा कि पति-पत्नी के बीच अटूट विश्वास, समर्पण और निरंतर बढ़ता प्रेम ही सफल गृहस्थ जीवन की पहचान है.
मन को बंधन का कारण बताते हुए आचार्य ने कहा कि जिस दिन यह भाव मन में आ जाए कि “मेरा सब कुछ ठाकुर जी का है”, उसी दिन सारे दुख और भय समाप्त हो जाते हैं. जो शांत, निष्काम, करुणामय और ईश्वरभक्त होते हैं, उनकी रक्षा स्वयं भगवान करते हैं.
ध्रुव और प्रह्लाद की कथा का विस्तार से वर्णन करते हुए बताया गया कि जीव की आत्मा में चेतना केवल भगवान की कृपा से ही आती है. कथा के दौरान भक्ति संगीत का सुमधुर गायन डा० रामनाथ ओझा ने किया, जिससे पूरा वातावरण राममय हो गया.




.png)


.png)
.gif)







0 Comments