रेलवे अस्पताल खुद वेंटिलेटर पर, एक डॉक्टर के भरोसे हजारों जिंदगियां ..

रेलवे अस्पताल खुद बदहाली की पटरी पर दौड़ रहा है. रेल कर्मचारियों और यात्रियों को आपातकालीन चिकित्सा सुविधा देने के लिए बना यह अस्पताल आज प्रशासनिक उपेक्षा का जीता-जागता उदाहरण बन चुका है.

जर्जर रेलवे अस्पताल के अंदर बैठे चीफ हेल्थ इंस्पेक्टर 





                               


  • वंदे भारत के दौर में बदहाल अस्पताल
  • एक डॉक्टर के भरोसे पूरी व्यवस्था

बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : भारतीय रेलवे एक तरफ बुलेट ट्रेन और आधुनिक वंदे भारत एक्सप्रेस के जरिए विश्वस्तरीय होने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ दानापुर-पंडित दीनदयाल उपाध्याय रेलखंड पर स्थित बक्सर का अनुमंडलीय रेलवे अस्पताल खुद बदहाली की पटरी पर दौड़ रहा है. रेल कर्मचारियों और यात्रियों को आपातकालीन चिकित्सा सुविधा देने के लिए बना यह अस्पताल आज प्रशासनिक उपेक्षा का जीता-जागता उदाहरण बन चुका है.

अस्पताल में संसाधनों और मैनपावर की भारी कमी है. चीफ हेल्थ इंस्पेक्टर संजीव कुमार ने बताया कि पूरे अस्पताल की जिम्मेदारी फिलहाल सिर्फ एक चिकित्सक के कंधों पर है, जिन्हें चौबीसों घंटे ऑन ड्यूटी रहना पड़ता है. अस्पताल में डॉक्टरों के दो से तीन पद स्वीकृत हैं, लेकिन केवल एक डॉक्टर कार्यरत हैं. फार्मासिस्ट के दो पदों में एक कर्मचारी तैनात है, जबकि सफाईकर्मी और हॉस्पिटल अटेंडेंट की स्थिति भी बेहद खराब है. सबसे चिंताजनक बात यह है कि अस्पताल में एक भी नर्सिंग स्टाफ मौजूद नहीं है.

रोज 40 मरीज, फिर भी रेफरल सेंटर बना अस्पताल

अस्पताल में तैनात डॉ. हरिओम पाठक ने बताया कि हर दिन औसतन 40 ओपीडी मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं. इसके अलावा रात में भी तीन से चार इमरजेंसी मरीजों को अटेंड करना पड़ता है. उन्होंने कहा कि सीमित संसाधनों के बावजूद मरीजों को बेहतर सेवा देने की कोशिश की जा रही है. हालांकि विशेषज्ञ डॉक्टरों और आधुनिक लाइफ सपोर्ट सिस्टम के अभाव में गंभीर मरीजों को दानापुर मंडल अस्पताल या पटना रेफर करना मजबूरी बन गया है. ऐसे में रास्ते के दो से तीन घंटे मरीजों की जिंदगी पर भारी पड़ सकते हैं.

पांच हजार रेलकर्मियों की लाइफलाइन पर संकट

दानापुर से डीडीयू के बीच करीब 200 किलोमीटर लंबे रेलखंड में बक्सर का यह इकलौता अनुमंडलीय रेलवे अस्पताल हजारों रेलकर्मियों और उनके परिवारों के लिए लाइफलाइन बना हुआ है. बक्सर, डुमराव, बिहिया और आरा जैसे स्टेशनों पर तैनात स्टेशन मास्टर, ट्रैकमैन, गेटमैन समेत लगभग पांच हजार आश्रित इसी अस्पताल पर निर्भर हैं. चलती ट्रेन में किसी यात्री की तबीयत बिगड़ने पर भी इमरजेंसी मेमो के जरिए यहां के डॉक्टरों को ही बुलाया जाता है. लेकिन जब अस्पताल खुद बीमार हो, तो दूसरों का इलाज कैसे होगा.

टपकती छत के नीचे हो रहा इलाज

अस्पताल भवन की हालत भी बेहद जर्जर हो चुकी है. बरसात के दिनों में छत से लगातार पानी टपकता रहता है, जिससे दवाएं और महंगे उपकरण खराब होने की कगार पर पहुंच जाते हैं. सीलन के कारण हर वक्त शॉर्ट सर्किट और फॉल सीलिंग गिरने का खतरा बना रहता है. अस्पताल कर्मियों और मरीजों में हर समय डर का माहौल बना रहता है. इस बदहाली को लेकर ईस्ट सेंट्रल रेलवे कर्मचारी यूनियन और रेलयात्री संघर्ष समिति सहित कई संगठनों ने दानापुर मंडल के डीआरएम से शिकायत भी की, लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है.

दो करोड़ के प्रस्ताव पर टिकी उम्मीद

ए.ई.एन. समय सिंह मीणा ने बताया कि अस्पताल के नए और आधुनिक भवन के निर्माण के लिए दो करोड़ रुपये का प्रस्ताव उच्च विभाग को भेजा गया है. इसके अलावा मानसून को देखते हुए जुलाई महीने में अस्पताल की तात्कालिक मरम्मत कराने की तैयारी है. हालांकि बड़ा सवाल यह है कि जब बिहार में मानसून जून के आखिरी सप्ताह में ही दस्तक दे देता है, तो जुलाई में होने वाली मरम्मत क्या सिर्फ कागजी पैचवर्क बनकर रह जाएगी. तब तक भारी ओपीडी और टपकती छत के बीच डॉक्टर और मरीज आखिर किस भरोसे रहेंगे.














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