जिला अधिवक्ता संघ द्वारा सोमवार, 15 जून 2026 को न्यायालय में नो वर्क रखने का निर्णय लिया गया है. इस दौरान अधिवक्ता न्यायिक कार्यों से विरत रहकर दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे.
- तीन पीढ़ियों से न्याय और वकालत की परंपरा का रहे चेहरा
- अधिवक्ताओं, मुवक्किलों और आम लोगों के लिए खुला रहता था उनका दरवाजा
बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : जिले की न्यायिक दुनिया में शनिवार की शाम आठ बजे एक ऐसा अध्याय समाप्त हो गया, जिसकी भरपाई शायद आने वाले वर्षों में भी संभव नहीं होगी. सिविल लाइंस मोहल्ले के निवासी वरीय अधिवक्ता विजय कुमार वर्मा उर्फ झब्बु बाबू का निधन नोएडा के एक अस्पताल में इलाज के दौरान निधन हो गया. वह कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे. उनके निधन के साथ ही जिले ने न केवल एक प्रतिष्ठित अधिवक्ता, बल्कि न्यायिक परंपरा, सामाजिक सरोकार और मानवीय मूल्यों के एक जीवंत प्रतीक को खो दिया है.
झब्बु बाबू उन विरले अधिवक्ताओं में थे जिनके नाम से ही न्यायालय परिसर में सम्मान का भाव झलकता था. बक्सर के अनेक वरिष्ठ अधिवक्ता, जो आज स्वयं न्यायिक क्षेत्र में स्थापित नाम हैं, उन्होंने वकालत पेशे की बारीकियां उन्हीं के सान्निध्य में सीखीं. उनके मार्गदर्शन में तैयार हुई अधिवक्ताओं की पूरी पीढ़ी आज न्यायालयों में अपनी सेवाएं दे रही है.
विजय कुमार वर्मा ऐसे परिवार से आते थे जिसकी पहचान पीढ़ियों से न्यायिक सेवा से जुड़ी रही है. उनके पिता भी ब्रिटिश शासनकाल में बक्सर के प्रतिष्ठित अधिवक्ता थे. पुरानी कचहरी के समीप स्थित उनका पैतृक आवास शहर की पहचान माना जाता था. भूमिहारी स्कूल के निकट स्थित यह भव्य भवन किसी जमींदार की हवेली से कम नहीं था. विशाल बरामदा, बड़ा आंगन और खुले दरवाजे उस दौर की न्यायिक संस्कृति की कहानी कहते थे, जब वकील और मुवक्किल के संबंध केवल पेशेवर नहीं बल्कि पारिवारिक हुआ करते थे.
बताया जाता है कि गांवों से मुकदमे की पैरवी के लिए आने वाले लोग रात होने पर उसी बरामदे में ठहर जाते थे. न्यायालय के कई छोटे कर्मचारी भी वर्षों तक उनके आउटर हाउस में बिना किसी शुल्क के रहते थे. उनके घर पहुंचने वाला कोई भी व्यक्ति स्वयं को अतिथि नहीं बल्कि परिवार का सदस्य महसूस करता था.
पुरानी कचहरी के समीप स्थित उनका आवास वास्तव में न्याय का एक मंदिर माना जाता था, जहां जरूरतमंदों को सलाह, सहयोग और सहारा मिलता था. यही कारण है कि उनका प्रभाव केवल न्यायालय तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक जीवन में भी उनकी अलग पहचान थी.
आज उनकी तीसरी पीढ़ी भी वकालत के पेशे से जुड़ी हुई है, लेकिन झब्बु बाबू का व्यक्तित्व, उनका रुतबा, उनकी सादगी और न्यायिक जगत में उनकी स्वीकार्यता ऐसी विरासत है जिसे शब्दों में बांधना कठिन है. बक्सर ही नहीं, बल्कि आसपास के न्यायिक क्षेत्रों में भी ऐसे व्यक्तित्व विरले ही देखने को मिलते हैं.
उनके निधन की खबर से अधिवक्ताओं, न्यायिक कर्मियों और आम नागरिकों में शोक की लहर है. लोगों का मानना है कि झब्बु बाबू केवल एक वकील नहीं थे, बल्कि बक्सर की न्यायिक परंपरा के जीवंत इतिहास थे. उनके जाने से एक ऐसा शून्य उत्पन्न हुआ है, जिसे भर पाना आसान नहीं होगा.
अधिवक्ता संघ के महासचिव बिंदेश्वरी प्रसाद पांडेय उर्फ पप्पू पांडेय ने कहा कि दिवंगत अधिवक्ता को श्रद्धांजलि देने के लिए सोमवार को व्यवहार न्यायालय के सभी अधिवक्ता न्यायिक कार्यों से विरत रहेंगे.





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