डुमरांव के लेखक की अनोखी पहल, 28 वर्षों से रोजा रखकर दे रहे सौहार्द का संदेश ..

पिछले करीब तीन दशकों से रमजान के महीने में नियमित रूप से रोजा रखते आ रहे हैं. उनका मानना है कि यह सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज में “आपसी मिल्लत” और शांति स्थापित करने का माध्यम है.






                                 



  • हिंदू होते हुए भी हर रमजान निभा रहे आस्था का अनुशासन
  • साहित्य और साधना के जरिए गंगा-जमुनी तहजीब को कर रहे जीवंत

बक्सर टॉप न्यूज, बक्सर : जिले के डुमरांव में सांप्रदायिक सौहार्द की एक अनूठी और प्रेरणादायक मिसाल सामने आई है, जहां एक स्थानीय लेखक बीते 28 वर्षों से लगातार रोजा रखकर समाज को एकता और भाईचारे का संदेश दे रहे हैं. उनका यह प्रयास न केवल धार्मिक सीमाओं को पाट रहा है, बल्कि आपसी सद्भाव की मजबूत नींव भी रख रहा है.

डुमरांव की मिट्टी से जुड़े और वर्तमान में पटना में रहने वाले लेखक मुरली मनोहर श्रीवास्तव पिछले करीब तीन दशकों से रमजान के महीने में नियमित रूप से रोजा रखते आ रहे हैं. उनका मानना है कि यह सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज में “आपसी मिल्लत” और शांति स्थापित करने का माध्यम है.

मुरली मनोहर श्रीवास्तव अपने साहित्यिक योगदान के लिए भी खास पहचान रखते हैं. उन्होंने देश के महान शहनाई वादक भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के जीवन पर गहन शोध कर पुस्तक लिखी, जो वर्ष 2009 में प्रकाशित हुई थी. इस कृति के लिए उनका नाम इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज किया जा चुका है. यह पुस्तक उस्ताद के जीवन पर लिखी गई प्रमुख शोध आधारित कृतियों में गिनी जाती है.

सिर्फ यही नहीं, उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर “विकास पुरुष” तथा 1857 के महान सेनानी वीर कुंवर सिंह पर “वीर कुंवर सिंह की प्रेमकथा” सहित कई पुस्तकों की रचना की है. उनकी लेखनी में गंगा-जमुनी तहजीब की स्पष्ट झलक मिलती है, जो विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों को जोड़ने का काम करती है.

स्थानीय लोग मुरली मनोहर श्रीवास्तव के इस कदम को समाज के लिए प्रेरणा मानते हैं. उनका कहना है कि आज के दौर में जब समाज में विभाजन की बातें होती हैं, ऐसे में इस तरह की पहल लोगों को एकजुट रहने का संदेश देती है.












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