धर्म और परिवार में चुनना पड़े तो धर्म को चुनें, श्रीकृष्ण की यही सबसे बड़ी सीख : आचार्य कृष्णानन्द शास्त्री "पौराणिक"

कहा कि सनातन धर्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें स्वयं ईश्वर विभिन्न रूपों में अवतार लेकर धर्म की रक्षा करते हैं. उन्होंने कहा कि भगवान का मनुष्य रूप में अवतार केवल दुष्टों के संहार के लिए नहीं, बल्कि मानवता, सदाचार और नैतिक मूल्यों की स्थापना के लिए होता है.





                              



  • सिद्धाश्रम धाम में श्रीमद्भागवत कथा के सातवें दिन भगवान श्रीकृष्ण के जीवन प्रसंगों का हुआ विस्तृत वर्णन
  • सनातन धर्म को मानवता, सदाचार और मानवीय मूल्यों की रक्षा का आधार बताया गया

बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : सर्वजन कल्याण सेवा समिति, सिद्धाश्रम धाम बक्सर द्वारा आयोजित 18वें धर्म आयोजन के अंतर्गत रविवार को श्रीमद्भागवत कथा के सातवें दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी. कथा के दौरान कथावाचक आचार्य कृष्णानन्द शास्त्री "पौराणिक" ने भगवान श्रीकृष्ण के अवतार, उनकी लीलाओं तथा सनातन धर्म की विशेषताओं पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि जब धर्म और परिवार में से किसी एक का चयन करना पड़े तो धर्म को ही प्राथमिकता देनी चाहिए, क्योंकि धर्म ही मानवता और समाज की रक्षा का आधार है.

आचार्य कृष्णानन्द शास्त्री "पौराणिक" ने कहा कि सनातन धर्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें स्वयं ईश्वर विभिन्न रूपों में अवतार लेकर धर्म की रक्षा करते हैं. उन्होंने कहा कि भगवान का मनुष्य रूप में अवतार केवल दुष्टों के संहार के लिए नहीं, बल्कि मानवता, सदाचार और नैतिक मूल्यों की स्थापना के लिए होता है.

उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम के अवतार से पूर्व रावण और भगवान श्रीकृष्ण के अवतार से पूर्व कंस का अत्याचार चरम पर था. उस समय समाज में माता-पिता, गुरु और अतिथि के सम्मान जैसी परंपराएं कमजोर पड़ गई थीं. चारों ओर भय, अन्याय और अराजकता का वातावरण था. ऐसे समय में भगवान ने अवतार लेकर धर्म और मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना की.

कथा के दौरान आचार्य ने भगवान श्रीकृष्ण के 128 वर्ष के जीवनकाल का उल्लेख करते हुए गोकुल, वृंदावन, मथुरा और द्वारका की विभिन्न लीलाओं का वर्णन किया. उन्होंने बताया कि गोकुल और वृंदावन में बाल एवं माधुर्य लीलाएं, मथुरा में रण लीलाएं तथा द्वारका में राज्य, भक्त संरक्षण और वात्सल्य लीलाएं संपन्न हुईं. इन प्रसंगों को सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे.

आचार्य कृष्णानन्द शास्त्री "पौराणिक" ने कहा कि श्रीकृष्ण और श्रीराम दोनों ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि धर्म की रक्षा सर्वोपरि है. उन्होंने वर्तमान समाज की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज मनुष्य धन, पद, प्रतिष्ठा और भौतिक सुखों के पीछे भागते हुए धर्म और नैतिक मूल्यों से दूर होता जा रहा है. उन्होंने कहा कि यदि श्रीमद्भागवत कथा के संदेशों को जीवन में उतारा जाए तो समाज में व्याप्त कुरीतियों, बुराइयों और नैतिक पतन को दूर किया जा सकता है.

कथा के अंत में श्रद्धालुओं ने धर्म, सदाचार और मानवता के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया.













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